मन का सार:कविता
बूँद की तलाश एक बूंद के लिए किसान तकता आसमान है। श्यामल नीरद घनघोर देख हर्षित जान - प्राण है । नभ से बही निर्झरी , भिगोती सब का मन है। नित्य क्रिया की पूर्ति, नहीं संभव बिना जल है । धरा भर आँचल में अमृत, बाँटे नदी सरोवर। घड़े-नाद भरे, पशु-पक्षी विचरते तृप्त हो कर। बचे जल जमा होते , प्यास बुझाते जन-जन की। जल वह अमृत है, जो देता तृप्ति अनंत जीवन की। नहीं मिले नभ को बादल, आये नहीं हरियाली। सूखा आँचल धरा का, बाँटे कैसे अमृत आली। वक्ष धरा का रीता, कहाँ से पाओगे जीवन। प्यासी दुनिया, प्यासे खग-मृग, प्यासा है मन। किसान बरबाद होगा, जल जाएंगे जब खेत। मर जाएंगे अरण्य, दिखेंगे चारों ओर रेत। वायु काली हो जाएगी , नली होगी अवरुद्ध । जीना दुश्वार होगा, दाने -दाने को होगा युद्ध । अस्त-व्यस्त जीवन होगा, फटा धरती का अंतर्मन । बचा कर एक बूंद जल, महसूस करोगे परिवर्तन। 5/9/19 साकार अतीत दिव्य पुंज क्षितिज से उतरा घर-आंगन रौशन हुआ कोना-कोना, दिल हुआ मगन। अंक में आया सुमन, फैला लिया आँचल। आशीष माँ का प...