विजय गाथा 

खींचता  ठेला, फूलती  सांसें , बेदम जान 
जीर्ण-काया , थरथराते पांव, फटे परिधान | 
बेबस आँखें , तोलता बोझ कांपते हाथों में ,
पैरों  की ताकत से करता पहिया गतिमान | 
भीड़ को चीरता बढ़ता आगे ,
होड़ लगाता मशीनी ताक़त से।
फूलती नसें तन-बदन की
झोंक दी बेबसी सारी अपनी।
कर गया अभिमान ख़ुद पर
जब पीछे रह गई लौह-धौंकनी।
जीत का बिगुल बजा तकता नभ
मानो सुन रहा विजय-ध्वनि।।


मानव श्रम की श्रेष्ठता का प्रभावी ज़िक्र करती हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति. प्रशंसनीय शैली. कविता के ऐसे विषय मौलिकता की पहचान हैं. उत्कृष्ट रचना. 

Comments